“60 किलोमीटर दूर उम्मीद की चौपाल” जहां आज़ादी के बाद पहली बार पहुंचा कोई जिलाधिकारी।

“60 किलोमीटर दूर उम्मीद की चौपाल” जहां आज़ादी के बाद पहली बार पहुंचा कोई जिलाधिकारी।

खटोली के लोगों ने कहा अब लगता है सरकार सच में हमारे गांव आई है।

चम्पावत। यूं ही नहीं कि जिलाधिकारी मनीष कुमार अपनी विशिष्ट कार्यशैली और संवेदनशील प्रशासन के लिए पूरे उत्तराखंड में अलग पहचान रखते हैं। अवकाश के दिन भी ग्रामीण जनजीवन से आत्मसात करने की उनकी कार्य संस्कृति रविवार को एक बार फिर देखने को मिली, जब वे जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित दुर्गम खटोली गांव पहुंच गए — वह गांव जहां आज़ादी के बाद आज तक कोई जिलाधिकारी ग्रामीणों के बीच नहीं पहुंचा था।

संचार सुविधाओं से जूझता, मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव और तमाम समस्याओं से घिरा यह दूरस्थ इलाका वर्षों से प्रशासनिक उपेक्षा का दर्द झेल रहा था। ऐसे में अचानक जिलाधिकारी के गांव पहुंचने की खबर ने ग्रामीणों के भीतर जैसे नई उम्मीद जगा दी। सूचना देर से मिलने के बावजूद तल्ली खटोली, मल्ली खटोली, वेला और पछनाई गांवों से बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए। कई ग्रामीण तो जिलाधिकारी को निहारते ही रह गए, क्योंकि जीवन में पहली बार वे किसी जिलाधिकारी से रूबरू हो रहे थे। कुछ लोग तो आज तक केवल कल्पना ही करते थे कि “जिलाधिकारी आखिर होता कैसा है?”

ग्रामीणों ने देखा कि जिला अधिकारी के रूप में उनके सामने कोई औपचारिकता से घिरा अधिकारी नहीं, बल्कि बेहद साधारण व्यक्तित्व वाला, मधुर वाणी में आत्मीयता से बात करने वाला इंसान खड़ा था। हर व्यक्ति का हाल-चाल पूछना, मुस्कुराकर संवाद करना और समस्याओं को गंभीरता से सुनना लोगों के मन को छू गया। ग्रामीणों का कहना था कि उन्होंने सुन रखा था कि “आजकल ऐसे जिलाधिकारी आए हैं जो लोगों के काम फटाफट करते हैं”, लेकिन उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह अधिकारी एक दिन उनके गांव की चौपाल में बैठा मिलेगा।

गांव में लगी चौपाल में जिलाधिकारी ने स्वयं अपने हाथों से ग्रामीणों की समस्याएं और आवश्यकताएं लिखीं तथा एक-एक व्यक्ति से संवाद किया। समस्याओं का अंबार था— गांव में शौचालयों का अभाव, खेती पर निर्भर परिवारों के पास गौशालाओं की कमी, गरीबों की जर्जर झोपड़ियां, पेयजल और सिंचाई सुविधाओं का संकट, नेटवर्क न होने से जी-राम योजना प्रभावित होना और बिजली व्यवस्था की दिक्कतें।

शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी बेहद चिंताजनक सामने आई। इंटरमीडिएट स्तर का निजी विद्यालय तो है, लेकिन वहां केवल पांच शिक्षक और दो बाबू तैनात हैं। बच्चों की विज्ञान विषय पढ़ने की इच्छा के बावजूद हाईस्कूल में विज्ञान प्रयोगशाला और विज्ञान कक्ष तक उपलब्ध नहीं है।

चौपाल के दौरान मल्ली खटोली की एक दिव्यांग बेटी को देखकर जिलाधिकारी ने उसके उपचार की व्यवस्था जिला अस्पताल में कराने और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। वहीं धनी देवी का परिवार वर्षों से परिवार रजिस्टर में नाम न होने के कारण सरकारी योजनाओं से वंचित था। 14 वर्षों से लापता पति कुंदन बुराठी की पत्नी ने भी जिलाधिकारी को अपनी पीड़ा सुनाई और बच्चों की दयनीय स्थिति दिखाते हुए पति की खोज तथा बच्चों के पालन-पोषण में सहायता की गुहार लगाई।

ग्रामीणों ने जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा, सिंचाई नहर, पेयजल संचयन और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग भी रखी। मल्ली खटोली की प्रधान सोनिया बिष्ट, तल्ली खटोली की प्रधान चंद्रा बुराठी सहित नवीन सिंह, अनीता, पवन सिंह और भूपाल बुराठी ने कहा कि जिलाधिकारी से अपनी बात कहकर गांव वालों का वर्षों पुराना बोझ हल्का हो गया है।

जिलाधिकारी मनीष कुमार ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि वह यहां की परिस्थितियां देख और समझ गए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ समय बाद गांव का बदला हुआ स्वरूप लोगों को दिखाई देगा और जिन समस्याओं को ग्रामीणों ने रखा है, उनमें निश्चित रूप से परिणाम नजर आएंगे। पूरे कार्यक्रम के दौरान विकासखंड अधिकारी अशोक अधिकारी भी मौजूद रहे।

Jaya punetha editor in chief ।

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