नई दिल्ली। वैश्विक व्यापार व्यवस्था इस समय गहरे संकट से गुजर रही है और बहुपक्षीय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार विश्व व्यापार संगठन, जो कभी नियम-आधारित वैश्विक व्यापार का मजबूत स्तंभ माना जाता था, आज विश्वास के संकट का सामना कर रहा है।
विश्लेषण के अनुसार इस संकट की जड़ें किसी एक घटना में नहीं, बल्कि लंबे समय से विकसित हो रहे संरचनात्मक असंतुलन, असमान नियम प्रवर्तन और बदलते वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में छिपी हैं। वैश्विक उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं का अत्यधिक केंद्रीकरण कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पक्ष में झुक गया है, जिससे जहां दक्षता बढ़ी, वहीं पूरी प्रणाली अधिक संवेदनशील भी हो गई है।
भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान अब केवल व्यापारिक मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी जोड़ा जा रहा है। इसके चलते कई देश संरक्षणवादी नीतियों, निर्यात नियंत्रण और आक्रामक औद्योगिक रणनीतियों को अपनाने लगे हैं, जो बहुपक्षीय सहयोग की भावना को कमजोर कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डब्ल्यूटीओ की सबसे बड़ी चुनौती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को नियमों के पालन के लिए जवाबदेह ठहराने में उसकी सीमित क्षमता है। नियमों का असमान अनुपालन और कमजोर प्रवर्तन तंत्र संगठन की विश्वसनीयता को प्रभावित कर रहे हैं। खासतौर पर वैश्विक दक्षिण के देशों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि डब्ल्यूटीओ अब निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने में कमजोर पड़ रहा है।
ऐसे में डब्ल्यूटीओ सुधार की आवश्यकता पर व्यापक सहमति तो है, लेकिन इसके स्वरूप और दिशा को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। हाल के मंत्रिस्तरीय सम्मेलनों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और सहमति-आधारित निर्णय प्रक्रिया जैसे मूल सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इन्हें लागू करने में कठिनाइयाँ सामने आ रही हैं।
बहुपक्षीय समझौतों (Plurilateral Agreements) को कुछ देश आगे बढ़ने का व्यावहारिक विकल्प मानते हैं, जहां इच्छुक देश नए नियम बना सकते हैं। हालांकि, इस मॉडल को लेकर भी मतभेद हैं, क्योंकि इससे व्यापक बहुपक्षीय ढांचे के कमजोर होने का खतरा जताया जा रहा है।भारत का रुख इस मुद्दे पर संतुलित माना जा रहा है। भारत बहुपक्षीय समझौतों की उपयोगिता को स्वीकार करता है, लेकिन साथ ही यह भी जोर देता है कि ऐसे समझौते डब्ल्यूटीओ के मूल सिद्धांतों को कमजोर न करें और सभी सदस्य देशों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करें। भारत का मानना है कि इन समझौतों को बहुपक्षीय प्रणाली का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक बनाया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते डब्ल्यूटीओ में व्यापक और संतुलित सुधार नहीं किए गए, तो वैश्विक व्यापार प्रणाली में अस्थिरता और बढ़ सकती है, जिसका असर विश्व अर्थव्यवस्था पर दूरगामी होगा।
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Jaya punetha editor in chief ।




