सीमावर्ती गांव में अधिकारियों की लापरवाही, के चलते प्रतिवर्ष करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद भी , मौन पालन में नहीं हो पाया विकास।

 

मानेश्वर समाचार ।

6 जुलाई 2025

चंपावत: भारत नेपाल सीमा का विभाजन करने वाली महाकाली नदी से लगे सीमावर्ती गांवो में जिला प्रशासन द्वारा गठित अलग-अलग टीमों ने लोगों की आय बढ़ाने के लिए जिन कार्यक्रमों को अपनाने की संस्तुति की गई है, उसमें मौन पालन जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम कि सरासर अंधेखी की गई है।

दरअसल मौन पालन ऐसा कार्यक्रम है जिसमें बागवानी व मौन पालन की जुगलबंदी से ग्रामीणों को रोजगार एवं अतिरिक्त आय संवर्धन का जरिया बनाया जा सकता है। चंपावत जिले में मौन बॉक्सो के माइग्रेशन की परंपरा नहीं है लेकिन वक्त के साथ शहद की दो फसलें लेने के लिए ग्रीष्म ऋतु में बक्सों को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एवं शीतकाल में घाटी वाले क्षेत्रों में रखा जाना चाहिए । इससे फल व सब्जियों के उत्पादन में 30 से 35 फ़ीसदी इजाफा आने के साथ उत्पादों की गुणवत्ता में भी निखार आएगा। शीतकाल में जब सभी वनस्पतियां सूख जाती हैं तब घाटी क्षेत्र में सरसों व च्यूरा फूलने लगता है। इस कार्यक्रम को जिले में कुटीर उद्योग के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं।

मौन पालन कार्यक्रम को शुरू करने के लिए जिले में एक भी विशेषज्ञ नहीं है। यदि सही मायनों में इसे संचालित किया जाए तो यह मॉडल जिले को नई पहचान दे सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस कार्यक्रम को शुरू करने के लिए पहले ही जोर दे चुके हैं।

 

चंपावत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है मौन पालन- हरीश तिवारी

 

चंपावत। मौन पालन विशेषज्ञ एवं जिले में डीएचओ के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हरीश तिवारी का कहना है कि जिले के सभी स्थानों में मौन पालन कार्यक्रम के फलीभूत होने की व्यापक संभावनाएं हैं। नेपाल के सीमावर्ती गांव में तो इसके उत्पादन की और अपार संभावनाएं हैं।

 

चंपावत। सीडीओ डॉ. जीएस खाती का कहना है कि वाइब्रेंट गांव के विकास व रोजगार में मौन पालन कार्यक्रम को प्रमुखता से संचालित किया जाएगा। घाटी क्षेत्रों में पहाड़ का “कल्पवृक्ष” कहे जाने वाले च्यूरा के पौधों का व्यापक स्तर पर रोपण भी किया जाएगा।

Jaya punetha editor in chief ।

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