पलायन के दौर में पहाड़ों के लिए उम्मीद की मिसाल बने श्री राज भट्ट जो प्रतिवर्ष दो माह अपने लोगों के बीच, अपनी भाषा व पहाड़ी भोजन पर जीते हैं।

पलायन के दौर में पहाड़ों के लिए उम्मीद की मिसाल बने श्री राज भट्ट जो प्रतिवर्ष दो माह अपने लोगों के बीच, अपनी भाषा व पहाड़ी भोजन पर जीते हैं।

इंग्लैंड की ईलारा कंपनी के सीईओ होकर भी हर वर्ष माटी का तिलक लगाने गांव लौटते हैं, समाजसेवा में खर्च करते हैं 10 करोड़ से अधिक रुपए प्रतिवर्ष।

चंपावत। जहां पहाड़ों की सुंदर लेकिन संघर्षपूर्ण प्रकृति को छोड़कर लोग रोज़गार की तलाश में मैदानी क्षेत्रों की भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं, वहीं चंपावत जिले के पाटी विकासखंड अंतर्गत कनाकोट गांव के मूल निवासी राज भट्ट पलायन की इस पीड़ा के बीच एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करते आ रहे हैं। इंग्लैंड की प्रतिष्ठित ईलारा कंपनी के सीईओ होने के बावजूद श्री भट्ट हर वर्ष दो माह का समय निकालकर अपनी जन्मभूमि में लौटते हैं और माटी का तिलक लगाकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। गरीबी और संघर्ष से भरे जीवन से उठकर शिखर तक पहुंचे श्री भट्ट आज न केवल चंपावत बल्कि पूरे उत्तराखंड में सेवा, संवेदना और समर्पण की पहचान बन चुके हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सशक्तिकरण में अतुलनीय योगदान। श्री भट्ट प्रतिवर्ष अपनी कमाई से 10 करोड़ रुपये से अधिक की राशि समाजसेवा के कार्यों में व्यय कर रहे हैं। उनके योगदान से शिक्षा के क्षेत्र में मेधावी छात्रों को मजबूत सहारा, स्वास्थ्य सेवाओं में जरूरतमंदों को राहत, दिव्यांग एवं नेत्रहीनों को सम्मानजनक जीवन, पर्वतीय महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के प्रयास, हताश और निराश लोगों के जीवन में नई आशा और मुस्कान। हाल ही में पिथौरागढ़ जिले के सीमांत क्षेत्र में आम लोगों को निःशुल्क एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किए जा रहे “सीमांत सेवा हॉस्पिटल” के लिए श्री भट्ट ने तीन करोड़ रुपये का अभूतपूर्व सहयोग प्रदान किया है, जिससे क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं को नई मजबूती मिलेगी। श्री भट्ट को ऐसी ईश्वरीय प्रेरणा मिली है कि यह गौ सेवा को अपने मिशन में मजबूत के साथ सामिल किए हुए हैं।

61 वर्षीय श्री राज भट्ट का पूरा जीवन समाज को समर्पित है। न किसी प्रचार की चाह, न किसी स्वार्थ का भाव। उन्होंने अपने सभी सेवा कार्यों को अपनी माता राधा देवी भट्ट एवं कर्मयोगी पिता डॉ. लीलाधर भट्ट के नाम समर्पित किया है। उनके संस्कारों और विचारों ने ही उन्हें यह राह दिखाई। इन कार्यों में लडवाल फाउंडेशन के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह लडवाल साए की तरह उनके साथ खड़े हैं। श्री भट्ट का व्यक्तित्व तब और विराट हो जाता है जब वे गांव में आम लोगों के बीच बैठकर अपनी बोली में संवाद करते हैं, मंडुवे की रोटी, भट्ट की चढ़क्वानी, गहत की दाल, भांग की चटनी और लाल चावल की खीर जैसे पारंपरिक पहाड़ी भोजन को अपनाते हैं। अपने दो माह के प्रवास के दौरान वे पूर्णतः पहाड़ी जीवनशैली और भोजन का ही अनुसरण करते हैं, जिससे उनका जुड़ाव और भी गहरा हो जाता है। जैसे पर्वतों से निकलने वाली नदी अपना रास्ता खुद बनाती है, वैसे ही श्री राज भट्ट ने भी संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई और आज देवभूमि उत्तराखंड में सेवा के हर क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं। उनका जीवन पहाड़ों के युवाओं के लिए यह संदेश देता है कि सफलता कहीं भी मिले, जड़ें अपनी माटी में ही मजबूत रहती हैं।

Jaya punetha editor in chief ।

पलायन के दौर में पहाड़ों के लिए उम्मीद की मिसाल बने श्री राज भट्ट जो प्रतिवर्ष दो माह अपने लोगों के बीच, अपनी भाषा व पहाड़ी भोजन पर जीते हैं।

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