शहीद की वीरांगना सरस्वती देवी की अंतिम इच्छा — जीआईसी और सड़क का नाम शहीद हरी सिंह के नाम पर रखा जाए।
लोहाघाट (चंपावत)। नियति का क्रूर खेल कभी-कभी इंसान के जीवन को ऐसी परीक्षा में डाल देता है, जिसकी कल्पना भी कठिन है। नेपाल सीमा से लगे बगोटी गाँव की रहने वाली वीरांगना सरस्वती देवी का सुहाग उस समय उजड़ गया था, जब वह मात्र 18 वर्ष की थीं। उनके पति शहीद हरी सिंह ने वर्ष 1971 के भारत–पाक युद्ध में देश की रक्षा करते हुए वीरगति पाई थी। सरस्वती देवी का विवाह मात्र 15 वर्ष की आयु में हुआ था और तीन वर्ष बाद ही नियति ने उनका सुहाग छीन लिया। पति की शहादत के बाद उन्होंने सामाजिक परंपराओं को तोड़ते हुए स्वयं सिर मुंडवाकर अपने पति का अंतिम संस्कार व क्रियाक्रम किया था। पिछले 54 वर्षों से यह वीरांगना अपने शहीद पति की तस्वीर के आगे दीप जलाकर उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए हैं। अब उनके परिवार में कोई अन्य सदस्य नहीं है। “मेरी अंतिम इच्छा – मेरे शहीद पति के नाम पर हो सम्मान” भावुक सरस्वती देवी ने कहा —
> “मैंने पूरा जीवन अपने पति की याद में गुजारा है। अब मेरी अंतिम इच्छा है कि राजकीय इंटर कॉलेज (जीआईसी) मडलक और बगोटी –गंगेश्वर – खेत सड़क मार्ग का नाम मेरे शहीद पति हरी सिंह के नाम पर रखा जाए। इससे मुझे आत्मिक शांति मिलेगी और मेरे शहीद पति की आत्मा को भी सुकून मिलेगा।” उक्त सड़क के बनने से क्षेत्र के उन लोगों की 35 किलोमीटर लंबी दूरी कम हो जाएगी जो पंचेश्वर में पूजा अर्चना व अपने परिजनो के अंतिम संस्कार में यहां आते है। इस सड़क का नाम अमर शहीद के नाम पर रखने से हर वक्त लोगों को उनका स्मरण होता रहेगा। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी से वीरांगना की इस भावना से प्रेरित होकर क्षेत्र पंचायत सदस्य अनीता पांडे ने जिलाधिकारी चंपावत को पत्र लिखकर वीरांगना एवं क्षेत्रीय जनता की भावनाओं से अवगत कराते हुए उनकी अंतिम इच्छा पूरी करने की मांग की है।
Jaya punetha editor in chief ।




