मानेश्वर समाचार।
चंपावत 25 जुलाई 2025
*मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में हरित ऊर्जा की नई पहल*
*कचरे से ऊर्जा की ओर: ग्राम पंचायत बस्तिया में बायोगैस संयंत्रों ने बदली तस्वीर*
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ते हुए अनेक अभिनव प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों की एक सशक्त मिसाल बनकर उभरा है चम्पावत जनपद का बस्तिया गांव, जहाँ मनरेगा योजना के तहत स्थापित बायोगैस संयंत्रों ने न केवल ग्रामीणों की रसोई बदली है, बल्कि उनके जीवन की दिशा भी बदल दी है।
ग्राम पंचायत बस्तिया में बीते दो वर्षों में 19 व्यक्तिगत बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए हैं। यह संयंत्र स्थानीय स्तर पर उत्पन्न जैविक अपशिष्ट से गैस बनाते हैं, जिसका उपयोग ग्रामीण परिवार खाना पकाने के लिए करते हैं। इससे परंपरागत ईंधनों जैसे लकड़ी और गैस सिलेंडर पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है।
इन संयंत्रों के माध्यम से न केवल घर के अंदर के वायु प्रदूषण में कमी आई है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं—विशेषकर महिलाओं और बच्चों में सांस की बीमारियों—में भी सुधार देखा गया है। यह पहल सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में एक ठोस कदम मानी जा रही है।
बायोगैस संयंत्रों का एक महत्वपूर्ण उपउत्पाद होता है – बायोस्लरी, जो एक उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग की जा रही है। इसका असर सीधे-सीधे फसल की गुणवत्ता और पैदावार में वृद्धि के रूप में सामने आया है। बस्तिया गांव के कई किसानों को अब रासायनिक खाद पर खर्च करना नहीं पड़ रहा है, जिससे उनकी कृषि लागत घटी है और आय में वृद्धि हुई है।
गांव की श्रीमती लक्ष्मी देवी, पत्नी गंगा सिंह, जो इस योजना की लाभार्थी हैं, अपने अनुभव साझा करते हुए कहती हैं- “इससे पहले खाना बनाने के लिए लकड़ियों पर निर्भर रहना पड़ता था। जंगल जाना, लकड़ी काटना और फिर धुएं में खाना बनाना हमारे लिए रोजमर्रा की कठिनाई थी। ऊपर से हर महीने सिलेंडर भरवाने के लिए करीब ₹850 खर्च करने पड़ते थे। लेकिन अब हमारे पास अपनी बायोगैस है—जिससे गैस भी मिलती है और खाद भी। जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आया है।”
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत इन बायोगैस संयंत्रों के निर्माण की औसत लागत ₹42,000 प्रति इकाई रही है। योजना के अंतर्गत लाभार्थियों से आंशिक अंशदान भी लिया गया है, जिससे संयंत्र के प्रति जिम्मेदारी और स्वामित्व की भावना विकसित हुई है। यही कारण है कि इन संयंत्रों की देखरेख ग्रामीण स्वयं कर रहे हैं और तकनीक के साथ सहजता से जुड़ रहे हैं।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में पर्यावरणीय संतुलन, ग्रामीण विकास और आजीविका संवर्धन को लेकर जो स्पष्ट विजन प्रस्तुत किया है, यह परियोजना उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मुख्यमंत्री ने समय-समय पर हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने और स्वच्छ ईंधन को ग्रामीण रसोइयों तक पहुँचाने की बात कही है। बस्तिया की यह सफलता कहानी उनके दृष्टिकोण की सफलता को भी दर्शाती है।
ग्राम पंचायत बस्तिया अब एक मॉडल पंचायत के रूप में उभर रही है। यह दर्शाता है कि यदि सरकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर ईमानदारी और सहभागिता के साथ क्रियान्वयन हो, तो हर गांव आत्मनिर्भर, स्वस्थ और स्वच्छ बन सकता है।




