जया पुनेठा।
चंपावत जनपद का दुर्भाग्य =====.============।
15सितम्बर 1997को चंपावत जनपद का गठन बहन मायावती ने पिथौरागढ़ जनपद का विभाजन कर के इस आशय से किया था कि छोटी इकाई होने से क्षेत्र वासियों विशेषकर गरीब जनता का शोषण नहीं होगा,उन्हें भी अपना हक हकूक मिलना आसान होगा एवम उनके जीवन में भी खुशहाली आयेगी,परन्तु ऐसा नहीं हो रहा है। शासन प्रशासन एवम भ्रष्ट नेताओं की मिली भगत के कारण बड़े बड़े शर्मयेदार एवं रसूखदार लोगों की तो चांदी कट रही है और सामान्य जन बेबस तथा लाचार हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।उदाहरण के लिए चंपावत में छतार पुल के पास एक लम्बा चौड़ा भूखण्ड इंडस्ट्री लगाने हेतु आवंटित किया गया जिसमें आठ दस प्लॉट छोटी छोटी इंडस्ट्री लगाने वाले लोगों को आवंटित किया जाना था।ऐसा होने से सैकड़ों लोगों को रोजी रोटी मिलती तथा क्षेत्र का विकास होता।परन्तु ऐसा नहीं हुआ।शर्मयेदार रसूखदार लोगों ने शासन प्रशासन से मिली भगत करके औने पौने दामों में प्राइम लोकेशन के प्लॉट अपने लिए आलोट करा लिए परन्तु किसी भी व्यक्ति ने वहां आजतक एक भी इंडस्ट्री नहीं लगाई।मेरी जानकारी में पूरे देश में ऐसा भ्रष्टाचार कहीं नहीं हुआ।उन प्लाटों पर किसी नं अपने आलीशान महल बनाए तो कई ने लक्जरी होटल।यह सब काम शासन प्रशासन की नाक के नीचे हुआ,इसका जवाब कौन देगा।होना तो यह चाहिए कि जिस कार्य के लिए जगह दी गई है उसे न करने पर सरकार उस एलॉटमेंट को निरस्त कर दे तथा जमीन अपने कंट्रोल में ले ले।भारत में ऐसी धांधली एक मिसाल है।इस जनपद एवं राज्य के होनहार नवयुवक नवयुवतियों का हक छीना गया है जो न केवल अन्याय है बल्कि महा पाप भी है।इस बात को लेकर जन मानस में भयंकर आक्रोश है जिसका परिणाम चंपावत जनपद केशासन एवं प्रशासन को भुगतना पड़ सकता है।इसी प्रकार चंपावत की जिला पंचायत तथा नगरपालिका परिषद द्वारा बनाई गई दुकानों के आवंटन में भयंकर धांधली हुई है और हो रही है। नियमानुसार इन दुकानों का आवंटन बेरोजगार युवक युवतियों को वरीयता के आधार पर होना चाहिए। आवंटन अधिकारी को यह अधिकार कहीं नहीं है कि वह अपनी मर्जी अथवा उच्च अधिकारी के दबाव में जिस किसी को दुकान आवंटित कर दे,यहां तक कि किसी किसी को तो दो दो अथवा तीन तीन दुकानें आवंटित कर दे। इस प्रकार के कारनामें भी केवल चंपावत जनपद में ही हो सकते हैं।आखिर आम जनता के हक को छीन कर रसूखदार लोगों को ही किसलिए लाभ पहुंचाया जा रहा है,यह एक यक्ष प्रश्न हैं।इसी प्रकार चंपावत में इंक्रोचमेंट का नाम लेकर अनेक लोगों को अनायास असंगत रूप परेशान करने के भी अनेक मामले सामने आ रहे हैं।न्याय संगत रूप ही आगामी समस्याओं का समाधान होना जनहित में है।शासन प्रशासन एवं जन प्रतिनिधियों का यह भी दायित्व है कि जिस कार्य में जनकल्याण हो उसे प्राथमिकता से पूरा कराए। लोहाघाट का सम्पूर्ण क्षेत्र सत्तर अस्सी वर्षों से नजूल भूमि होने का दंश झेल रहा है जिसका दर्द के निवासी आजतक झेल रहे हैं।अपने जीवन की समस्त कमाई एवं पूंजी लगाकर मकान दुकान बनाकर जीवन यापन करने वाले लोगों के दिल में कितना दर्द है,यह तो केवल भुक्तभोगी ही जानता है।दो दो,तीन तीन पीढ़ियों से लोग अपना विकास करने के लिए ऋण भी नहीं ले सकते।देश दुनिया की दौड़ में शरीक न हो पाना इनकी मजबूरी बन गई है,क्या यहां के लोग विदेशी हैं,जब भारत सरकार ने विदेशों से आए लोगों को भी हर सुविधा दे रही है।समस्त जन प्रतिनिधियों,शासन प्रशासन को प्रस्ताव भेज कर एवं दबाव डालकर यथा शीघ्र लोहाघाट के निवासियों को फ्रीहोल्ड करना न्याय संगत है।अन्यथा अपना अपना समय पास कर चले जाना किसी भी प्रकार से राष्ट्रधर्म नहीं है। यह बात नहीं भूलना है कि किस लालसा एवं उमंग से इंद्रमणि बड़ौनी एवं विपिन त्रिपाठी तथा सम्पूर्ण उत्तराखंड की आम जनता ने उत्तरा खण्ड के निर्माण में योगदान दिया था।कितने नवयुवकों तथा मातृशक्ति ने इसके निर्माण अपना जीवन भी न्यवछावर कर दिया था।क्या इसी लिए की कुछ चाटुकार एवं रसूखदार लोग मौज करें तथा आम जनता की कोई सुनने वाला न हो।शर्म आती है कुछ शासन प्रशासन के लोगों तथा जन प्रतिनिधियों पर जो केवल अपने फायदे में लगे हुए हैं,आम जनता जाए भाड़ में,उनका यह भ्रम भी जल्दी ही टूट जाएगा।वस्तु स्थिति में सुधार की दरकार है। जया पुनेठा,चौकबाजार,लोहाघाट,जनपद चंपावत उत्तराखंड।
Jaya punetha editor in chief ।





