मानेश्वर समाचार।
चंपावत 21 जुलाई 2025
*पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन बना आजीविका का नया आधार*
*मत्स्य पालन तालाब निर्माण से पाटी विकासखंड में ग्रामीणों को मिली आजीविका की नई राह*
उत्तराखंड के सीमांत जनपद चंपावत के पाटी विकासखंड में मत्स्य पालन ने ग्रामीण आजीविका को एक नई दिशा दी है। *पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित कृषि संभावनाओं के बीच, मत्स्य पालन जैसी वैकल्पिक गतिविधियाँ स्थानीय ग्रामीणों के लिए आर्थिक रूप से वरदान साबित हो रही हैं*।
जिला योजना अंतर्गत एच.एस.जी. महिला समूहों के लिए ₹2.01 लाख की लागत से निर्मित दो मत्स्य तालाबों की सफल परियोजनाएं इसका प्रमाण हैं। इन योजनाओं ने न सिर्फ मछली उत्पादन को बढ़ावा दिया है, बल्कि सिंचाई और मौसमी सब्जी उत्पादन के माध्यम से भी लाभार्थी परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
पाटी विकासखंड मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर परेवा ग्राम पंचायत के मजारी तोक में 15 मीटर लंबा, 8 मीटर चौड़ा और 1.5 मीटर गहरा तालाब निर्मित किया गया है, जिसकी जल भंडारण क्षमता लगभग 1.80 लाख लीटर है। यह तालाब 25 मीटर दूर एक प्राकृतिक जल स्रोत से एल्काथीन पाइप के माध्यम से निरंतर जलापूर्ति प्राप्त करता है। यह योजना दो परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचा रही है। इस तालाब से प्रति वर्ष 90 किलोग्राम मछली का उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग ₹27,000 की आय प्राप्त हो रही है। साथ ही तालाब के पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई में भी किया जा रहा है, जिससे मौसमी सब्जियाँ उगाकर लाभार्थियों को प्रति माह ₹1,000 और वार्षिक ₹12,000 तक की अतिरिक्त आमदनी हो रही है।
इसी प्रकार पाटी विकासखंड मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूर मछियाड ग्राम पंचायत के नवाड़ा तोक में 18 मीटर लंबा, 10 मीटर चौड़ा और 2 मीटर गहरा एक और बड़ा मत्स्य तालाब निर्मित किया गया है, जिसकी जल संग्रहण क्षमता लगभग 3.60 लाख लीटर है। तालाब को 60 मीटर दूर स्थित प्राकृतिक जल स्रोत से एल्काथीन पाइप और सिंचाई गूल के माध्यम से पानी उपलब्ध कराया जाता है। यह योजना चार परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचा रही है। यहां से प्रति वर्ष 125 किलोग्राम मछली का उत्पादन हो रहा है, जिसे स्थानीय बाजार में ₹300 प्रति किलोग्राम की दर से बेचकर लगभग ₹37,500 की वार्षिक आय हो रही है। इसके अतिरिक्त, तालाब के जल का उपयोग सिंचाई हेतु कर मौसमी सब्जियाँ उगाई जा रही हैं, जिससे लाभार्थियों को प्रतिमाह ₹1,500 और वार्षिक ₹18,000 की अतिरिक्त आमदनी हो रही है।
ये दोनों परियोजनाएं सिद्ध करती हैं कि स्थानीय संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, सरकारी सहयोग और ग्रामीणों की मेहनत से किस प्रकार आजीविका के नए और स्थायी साधन विकसित किए जा सकते हैं। मत्स्य पालन और सिंचाई का दोहरा लाभ इन योजनाओं को न केवल आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाता है, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी एक सकारात्मक पहल है। यह उदाहरण अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणादायक है, जो इसी तरह की योजनाओं को अपनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना सकते हैं।
Jaya punetha editor in chief ।



