ठंड आते ही गुलदार भी लगते हैं मुस्कुराने ।

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ठंड आते ही गुलदार भी लगते हैं मुस्कुराने

गांव घरों में ठंड के दिनों में लोगों को बरतनी चाहिए विशेष सावधानियां ।

 

जैसे ही पहाड़ों में ठंड ने दस्तक दी, जंगलों से होकर गाँवों, कस्बों और नगरों की भी थरथराहट बढ़ गई। लोगों की यह कँपकपी ठंड से नहीं बल्कि गुलदारों की दस्तक से आई है। हर साल की तरह इस बार भी सर्दी के साथ गुलदारों की आमद की कई खबरें आने लगीं हैं। मतलब गुलदारों का ‘शीतकालीन भ्रमण कार्यक्रम’ शुरू हो चुका है।

बरसात के बाद जब यहाँ के सीढ़ीदार खेतों में फसल कट जाती है तो उसके बाद घास कटाई शुरू हो जाती है। साथ ही जंगलों की घनी झाड़ियाँ पतझड़ होकर खुद साफ होने लगते हैं। ऐसे में गुलदार कहाँ छिपें? ऊपर से जंगलों में हिरण, सुअर, सियार जैसे इनके नियमित शिकार भी गाँवों, नगरों की ओर निकल पड़ते हैं। नतीजन गुलदारों की नजर लोगों की पालतू बकरियों, कुत्तों और गायों की तरफ़ हो जाती है। कभी-कभी घरों के आसपास खेलते बच्चों और राहगीरों तक भी इनकी कुदृष्टि पहुँच जाती है।

सब जानते हैं कि सर्दियों की रातें लंबी होती हैं। गुलदार भी धीरे-धीरे, धैर्य से, रात के अंधेरे में अपना शिकार तलाशते हैं। ज्यादा भूखे होने पर ये दिन में भी अपने शिकार ढूँढ कर मार लेते हैं। वर्षा ऋतु में पैदा हुए उनके शावक भी अब कदम से कदम मिलाकर चलते हैं, तो उनकी सुरक्षा के लिए कई बार मादा गुलदार इंसानों से भी भिड़ जाती है।

यद्यपि वन विभाग लोगों को सतर्क करता है कि-शाम के बाद जंगल की ओर न जाएं, बच्चों को देर तक बाहर न खेलने दें, और पशुओं के गोठ के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद रखें, तथापि सच कहें तो, सतर्कता सिर्फ़ जंगलायत महकमे को ही नहीं, सड़क और रास्तों की देखभाल करने वाले विभागों को भी रखनी चाहिए। सड़क किनारे उगी ऊँची झाड़ियाँ, घासें अब गुलदारों को शिकार देखने के अच्छे ‘वॉच टॉवर’ बन जाते हैं। इसलिए ज़रूरत है कि सड़क से जुड़े विभाग लोनिवि, एन.एच, पीएमजीएसवाय के अलावा जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत भी अपने संसाधनों से ग्रामीण मार्गों से झाड़ी कटान का अभियान चलाएं। साथ ही नागरिकों को भी जागरूक होकर अपने घरों के आसपास की घास-झाड़ियाँ समय-समय पर साफ़ करनी चाहिए।

आख़िर ठंड में जब सबको अपने-अपने घर की गर्माहट चाहिए — तो जंगल के इन मेहमानों को भी पेट भरने का हक़ तो चाहिए ही। बस इतना ध्यान रहे, उनका “ लंच,डिनर” किसी गाँव के घर-आँगन से न उठे।

Jaya punetha editor in chief ।