नवरात्रि–दशहरा : आत्मजागरण और अन्याय पर विजय का पर्व
भारतीय संस्कृति अपने चिंतनपूर्ण प्रभाव से ही विश्व की श्रेष्ठ संस्कृति में प्रतिष्ठित है। प्राचीनकाल के ऋषि-मुनियों ने गहन चिंतन-मनन कर पाया कि मूल आद्या शक्ति ही इस ब्रह्मांड को संचलित करती है। यह परात्पर ब्रह्म या देवी दुर्गा जगत की उत्पत्ति, पालन, संहार की ऊर्जा है। इस शक्ति स्वरूप माँ दुर्गा की उपासना का पर्व नवरात्रि हैं।
नवरात्रि धार्मिक अनुष्ठान के अलावा जीवन-दर्शन का दर्पण हैं। ये नौ रातें हमें बताती हैं कि शक्ति केवल मंदिरों की मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर भी सोई हुई है। क्या हम उस शक्ति को पहचानते हैं? या फिर आधुनिक “रावणों” के सामने चुपचाप झुक जाते हैं?
सीता जी के हरण के बाद उनकी खोज करते-करते प्रभु श्री राम बहुत व्याकुल हो गए। नारद जी की प्रेरणा से श्रीराम जी ने लंका विजय से पहले शक्ति स्वरूप माँ दुर्गा की आराधना की। दशमी को उन्होंने रावण का वध किया और धर्म की विजय सुनिश्चित की। यही दिन विजयदशमी कहलाया। संदेश साफ है कि साधना और आत्मबल के बिना विजय असंभव है।
आज समाज के सामने भीषण संकट हैं। पर्यावरण का विनाश, नारी असुरक्षा, सामाजिक विषमता, मानसिक तनाव और भौतिकता की अंधी दौड़। ये हमारे दौर के असुर हैं। इन्हें तलवारों से नहीं, आत्मबल से ही हराया जा सकता है। यह आत्मबल हमें आद्या शक्ति की साधना से मिलता है।
माँ दुर्गा के नौ रूप धैर्य, साधना, करुणा, साहस, शुद्धता और सकारात्मकता जैसे मूल्यों का संदेश देते हैं। यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा हैं। इनका हर रूप मानो हमें पुकार रहा हो—उठो, जागो और अन्याय के खिलाफ खड़े हो जाओ।
देशभर में यह पर्व अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। बंगाल की दुर्गापूजा, गुजरात का गरबा, उत्तर भारत की रामलीला और दशहरा, दक्षिण भारत की देवी आराधना। विविधताएँ अलग हैं, लेकिन संदेश एक है—असुरता पर विजय और आत्मबल का जागरण।
नवरात्रि नारीशक्ति के सम्मान का पर्व भी है। कन्या पूजन इसका जीवंत उदाहरण है। फिर सवाल उठता है कि जब हम नारी को देवी मानते हैं तो समाज में असुरक्षा और भेदभाव क्यों? असल पूजा तभी होगी जब हर नारी को समान अधिकार और गरिमा मिले।
सच्चाई यह है कि नवरात्रि केवल उपवास, भजन या डांडिया तक सीमित नहीं होना चाहिये। यह आत्मजागरण का आह्वान है। जब तक हम अपने भीतर की दुर्गा को नहीं जगाएँगे, तब तक न आधुनिक रावण मिटेंगे, न समाज सशक्त बनेगा।
हम नवरात्रि और दशहरा को केवल उत्सव न मानें। यह समय है अपने भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने का, अन्याय का प्रतिकार करने का और राष्ट्र को सशक्त दिशा देने का। तभी यह पर्व अपने सच्चे अर्थों में सफल होगा।
