शिक्षा में नवाचार और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की गूंज जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) में शुरू हुई दो दिनी राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला।
शिक्षा के नए आयाम और नैतिक मूल्यों की लौ जलाए रखेगी डायट लोहाघाट की राष्ट्रीय संगोष्ठी।
लोहाघाट। तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य और समाज में नैतिक मूल्यों की घटती संवेदनशीलता के बीच डायट लोहाघाट द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शिक्षा जगत के लिए एक सार्थक, चिंतनशील और दूरदर्शी पहल बनकर सामने आई। देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे शिक्षाविदों, विचारकों और शोधकर्ताओं ने शिक्षा के वर्तमान स्वरूप, भविष्य की चुनौतियों और नैतिक मूल्यों की अनिवार्यता पर गंभीर विमर्श किया। “शिक्षा के बदलते परिदृश्य एवं नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल युग में शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया भले ही आधुनिक तकनीक से समृद्ध हो रही हो, लेकिन अनुशासन, ईमानदारी, संवेदनशीलता, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक मूल्य आज भी शिक्षा की आत्मा हैं। यदि शिक्षा केवल सूचना, ज्ञान और कौशल तक सीमित रह जाए तथा चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों की उपेक्षा हो, तो समाज और राष्ट्र की दिशा भटक सकती है।
राष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत शुभारंभ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश प्रदीप मणि त्रिपाठी, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति नवीन चन्द्र लोहनी, जिलाधिकारी चम्पावत मनीष कुमार, सीईओ मेहरबान सिंह बिष्ट एवं डायट प्राचार्य मान सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। अतिथियों ने आधुनिक शिक्षण प्रणाली की चुनौतियों, विद्यालयों में नैतिक मूल्यों के क्षरण, एआई एवं डिजिटल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्स्थापना जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि तकनीक स्वयं न तो अच्छी है और न बुरी, उसकी दिशा मानव संवेदना और नैतिक दृष्टिकोण ही तय करते हैं। ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से 350 से अधिक शोधपत्र प्राप्त हुए हैं, जबकि दो दिवसीय आयोजन में 100 से अधिक प्रोफेसर, शोधार्थी एवं शिक्षक अपने शोधपत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अवसर पर डॉ. कमल गहतोड़ी द्वारा लिखित पुस्तकों “लाली” एवं “इन्फो स्प्रिंट” का विमोचन भी किया गया।
द्वितीय सत्र में पद्मश्री प्रो. जे.एस. राजपूत, संयुक्त शिक्षा निदेशक प्रयागराज महेंद्र कुमार सिंह, प्रो. यशपाल (रुहेलखंड विश्वविद्यालय), डॉ. सोमू सिंह (बीएचयू), प्रो. डॉ. प्रेम नारायण सिंह (वाराणसी), डॉ. लोकेश जिंदल (जेएनयू), प्रो. गीता रानी, डॉ. वंदना (आरआईई अजमेर), प्रो. डॉ. ऊषा (एनसीईआरटी) सहित अनेक ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों ने शिक्षा, नैतिकता और समाज के आपसी संबंधों पर अपने विचार साझा किए।
संगोष्ठी के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि शिक्षा ही समाज परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति है और इस शक्ति की जड़ें नैतिक मूल्यों में निहित हैं। भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए तकनीक के साथ-साथ मनुष्य के भीतर नैतिकता की लौ का जलते रहना अनिवार्य है। कार्यक्रम का संचालन कन्वेनर डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव, शिवराज सिंह तड़ागी, प्रकाश चन्द्र उपाध्याय एवं डॉ. मंजूबाला ने किया। सफल आयोजन में बीईओ भारत जोशी, डॉ. आशुतोष वर्मा, डॉ. अनिल कुमार मिश्रा, डॉ. अवनीश कुमार शर्मा, कमल गहतोड़ी, मनोज भाकुनी सहित अनेक शिक्षकों, शोधकर्ताओं एवं डीएलएड प्रशिक्षुओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
