सतयुग से महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी की पावन तपस्थली गुरु-शक्ति का अद्वितीय केंद्र, जहाँ आज भी अनवरत जल रहा है दिव्य धूना।
हजारों वर्षों पुरानी सनातन परंपरा में तल्लादेश स्थित यह धूना एक पावन, दिव्य और अत्यंत सिद्ध साधना स्थल के रूप में प्रतिष्ठित है।
चम्पावत। लोकमान्यता है कि सतयुग में स्वयं महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी ने इस स्थान पर गहन तपस्या कर अपनी अलौकिक योग शक्ति से इस दिव्य धूने की स्थापना की थी।तब से लेकर आज तक यह धूना अखंड रूप से प्रज्वलित है और निरंतर साधकों व श्रद्धालुओं को दिव्य ऊर्जा, शांति और गुरु-कृपा का अनुभव करवाता है। नाथ संप्रदाय की परम,परंपरा का जीवंत प्रतीक ‘गोरख धूना’ मंच केवल एक साधारण धूना नहीं, बल्कि नाथ परंपरा की अखंड साधना, आध्यात्मिक शक्ति और गुरु-भक्ति का सूक्ष्म प्रतीक है। माना जाता है कि यहाँ अनवरत जल रही अग्नि साधकों की साधना को सिद्धि प्रदान करती है तथा हर आगंतुक को अपने दिव्य तेज से अभिभूत कर देती है। जो भी श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं, वे एक अद्भुत आंतरिक शांति, दिव्य कंपन और गुरु गोरक्षनाथ जी की दयामयी कृपा का अनुभव करते हैं। अनेक श्रद्धालुओं ने यहाँ मनोकामना-पूर्ति और जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन का अनुभव किया है। यह दिव्य चमत्कारों का ऐसा पवित्र धाम हे जिसके धुने की महिमा
इतनी अनूठी है कि यहाँ आने वाला प्रत्येक भक्त किसी न किसी रूप में दिव्य कृपा का अनुभव अवश्य करता है। मान्यता है कि निसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिल जाता है। निर्धन व्यक्ति को धन, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। गंभीर रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है। साधकों को साधना में सिद्धियों का अनुभव होता है।मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है।
इस पावन स्थल से हिमालय का दिव्य, स्वर्गिक और अलौकिक दर्शन होता है, जो साधना और श्रद्धा को और अधिक गहन एवं पवित्र बना देता है। यहाँ धार्मिक नियम व आचार-विचार इतने कठोर हे कि इस पवित्र धूने के दर्शन और पूजा के लिए कुछ धार्मिक नियम अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं। परंपरानुसार धूने के दर्शन से तीन दिन पूर्व श्रद्धालुओं को मन वचन कर्म से शुद्ध होकर लहसुन एवं प्याज का पूर्णतः त्याग करना आवश्यक है। मंदिर एवं धूना परिसर में लहसुन-प्याज का सेवन या साथ लाना पूर्णतः वर्जित है। श्रद्धालुओं को पवित्र मन, शुद्ध आहार और सात्त्विक आचरण के साथ ही दर्शन हेतु आना चाहिए।यह नियम गुरु-परंपरा की पवित्रता और धूने की दिव्यता को अक्षुण बनाए रखने के लिए अनिवार्य माने जाते हैं। यहां अद्वितीय आस्था का शाश्वत दीप ‘गोरख धूना’ मंच सदियों से श्रद्धा, साधना और गुरु-शक्ति का उज्ज्वल केंद्र बना हुआ है। सतयुग से चली आ रही यह दिव्य अग्नि आज भी उतनी ही तेजस्वी, उतनी ही पवित्र और उतनी ही सिद्ध शक्तियों से युक्त है। जो भी व्यक्ति श्रद्धा और शुद्ध भाव से यहाँ कदम रखता है, वह अपने जीवन में एक अद्भुत आध्यात्मिक परिवर्तन अनुभव करता है।
फोटो- विश्व कल्याण के लिए यहां अग्नि को आहुतियां देते योगी रामनाथ जी महाराज व अन्य । सनातन की ध्वजा को अक्षुण रखते श्रद्धालु




